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मानसिक तनाव के कारण तथा उन्हें कैसे दूर करें || how to overcome depression

आधुनिक जीवन और मानव क्षमता

आज के युग में मानव जीवन अपने सबसे आरामदायक और आधुनिक चरण में है, जहाँ एक आम आदमी को भी किसी महान सिद्ध पुरुष जितनी क्षमता प्रदान है। आज हर कोई घर बैठे, कोसों दूर किसी इंसान से बात कर सकता है। वायुयान में बैठकर हवाई सफर करते हुए हजारों मील की दूरी घंटों में तय की जा सकती है। और भी अनगिनत उदाहरण हैं, जहाँ हम देख सकते हैं कि जो क्षमताएँ प्राचीन काल में ऋषि मुनियों को सालों-साल तपस्या करने से मिलती थीं, वह आज आम इंसान को बड़ी आसानी से उपलब्ध हैं।

यह इंसानों के लिए अच्छा भी है और बुरा भी। अच्छा क्यों है, यह तो आप अपने रोज़मर्रा के जीवन में अनुभव करते ही होंगे। मैं आपको बताऊँगा कि यह बुरा कैसे है और इसका बढ़ते तनाव से क्या लेना-देना है।

आइए पहले समझते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ इंसानों का दिमाग किस प्रकार तनाव उत्पन्न करने और उसे धारण करने के काबिल बनता जाता है।

एक छोटा बच्चा कभी तनाव में नहीं रहता। इसका कारण यही है कि वह हर चीज़ को, हर बात को बहुत जल्दी भूल जाता है। वही बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होता है, उसे विभिन्न चीज़ें सीखनी पड़ती हैं। दिमाग में बातों का और विभिन्न कार्यों को करने की विधियाँ उसे अपने दिमाग में सजों कर रखना पड़ता है। लेकिन यहाँ पर दिमाग यह फ़िल्टर लगाना भूलने लगता है कि किन बातों को सजों कर रखना है और कौन सी बातें डिलीट कर देनी हैं।

इस प्रकार इंसान के दिमाग की संरचना ऐसी बनती जाती है कि वह हर तरह की बातों, अनुभवों को समेटता जाता है और उन्हें ढोता जाता है। हालांकि, वैसे अनुभव जो हमारी 'सुख की परिभाषा' में फिट नहीं बैठती, वे उस विषधर के समान हैं जिससे हमारे दिमाग को दूर हो जाना चाहिए। परन्तु हमारा दिमाग सीखने और इकठ्ठा करने के लिए इस प्रकार अभ्यस्त हो जाता है कि जहरीली चीज़ें भी गले में लपेट लेता है, जो बार-बार इसे डंसते रहती हैं, और एक समय के बाद यह उन्हें अपना ही हिस्सा मान लेता है।


रिश्तों का तनाव और सोशल मीडिया का प्रभाव

आज के समाज में तनाव का मुख्य कारण रिश्तों की कड़वाहट है, और दूसरे नंबर पर करियर और सफल बनने की लालसा आ सकती है। मैंने इस लेख की शुरुआत ही आधुनिकीकरण के साथ की थी। इन दोनों प्रकार के तनावों में आधुनिकीकरण का अहम योगदान है।

दादी-नानी के जमाने में, रिश्तों में कड़वाहट को लेकर उतना तनाव नहीं रहता था जितना कि आज है। आज रिश्तों की बुनियाद इस बात पर रखी जा रही है कि “आप मेरी इन-इन उम्मीदों पर खरे उतरें, और अगर नहीं उतरे तो इसका मतलब है कि आपने मुझे धोखा दिया, मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी।”

असल में, हमारा दिमाग आज के ज़माने में बहुत अधिक डेटा संचित करता जा रहा है। और इसका मुख्य स्रोत है सोशल मीडिया। यहाँ हम दुनिया में क्या हो रहा है, एक पल में जान लेते हैं—किसके जीवन में क्या चल रहा है, किसके रिश्तों में कितनी खटास है, कितनी मिठास है, रिश्तों में खटास या मिठास की पराकाष्ठा क्या हो सकती है। इस प्रकार का असीमित डेटा रोज़ फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब आदि के माध्यम से हमारे दिमाग में प्रविष्ट होता है। इसके आधार पर हमारी उम्मीदों के दायरे बदलते जाते हैं, लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि हर इंसान अपने आप को उस हिसाब से ढाल पाए।

इतनी जानकारी रखने के बाद, हमारा दिमाग आसानी से अपूर्णता को पहचान लेता है (हालाँकि पूर्णता का दायरा बढ़ता ही जा रहा है), और यहीं से उत्पन्न होता है खिन्नता, असंतोष, जो अंततः कलह में तब्दील हो जाते हैं।


करियर और सफलता का तनाव

आज के समय में केवल रिश्तों की अपेक्षाएँ ही नहीं, बल्कि करियर और सफलता की लालसा भी मानव मस्तिष्क पर भारी तनाव डालती है। पहले के समय में लोग साधारण जीवन, अपने काम और परिवार में संतुष्टि पाते थे। परंतु अब, हर व्यक्ति अपने जीवन में उच्चतम सफलता, प्रसिद्धि, और दूसरों से श्रेष्ठ होने की अपेक्षा रखने लगा है।

आधुनिकीकरण ने इस लालसा को और तीव्र बना दिया है। कंप्यूटर, इंटरनेट, डिजिटल मंच और सोशल मीडिया के माध्यम से हम लगातार यह देख रहे हैं कि कौन कितना सफल है, कौन किस पद पर है, किसका व्यवसाय कितना फल-फूल रहा है। हर सफलता का प्रमाण तुरंत हमारे सामने आ जाता है। यह जानकारी हमारी अपेक्षाओं के मानक को निरंतर बढ़ा देती है।

इसका परिणाम यह होता है कि मानव मस्तिष्क हमेशा खुद को दूसरों के स्तर पर आंकने लगता है। अगर हम अपनी उपलब्धियों को दूसरों की तुलना में कम पाते हैं, तो यह असंतोष, चिंता और तनाव में बदल जाता है।

आधुनिकीकरण ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, परंतु इसके साथ ही सफलता की दौड़ भी तेज कर दी है। आज के युग में छात्र, कर्मचारी और उद्यमी—सभी पर यह दबाव है कि वे न केवल सफल हों, बल्कि अपनी सफलता को दूसरों के सामने प्रमाणित भी करें। इंटरनेट पर उपलब्ध सफलता की कहानियाँ, पेशेवर प्रोफाइल, पुरस्कार और प्रशंसा हमारे मस्तिष्क में यह संदेश डालती हैं कि “यदि मैं इन मानकों पर खरा नहीं उतरता, तो मैं पीछे रह गया।”


आदर्श छवि और वास्तविकता को स्वीकारना

हम अक्सर रिश्तों में यह भूल जाते हैं कि अगर कोई व्यक्ति हमारी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता, तो इसका मतलब यह नहीं कि उसने हमारा जीवन बर्बाद कर दिया। अगर उसकी गलती सिर्फ यही है कि वह कोशिश करने के बावजूद हमारी अपेक्षाएँ पूरी नहीं कर पा रहा, तो असल में यह उसकी कोई गलती है ही नहीं।

हमें वास्तविक जीवन में किसी इंसान को उसके अपने व्यक्तित्व के साथ स्वीकार करना चाहिए, न कि अपने मन में बनाई गई “आदर्श छवि” के हिसाब से। वह इंसान है, कोई रोबोट नहीं, जो हम अपनी इच्छानुसार फीचर्स अपलोड कर सकें।

यह “आदर्श छवि” भी केवल हमारे द्वारा बना हुआ नहीं होता, बल्कि यह समाज और सोशल मीडिया द्वारा थोपी हुई छवि है। वही समाज, रील्स, किसी के पूरे जीवन काल की केवल पाँच मिनट की घटना, जो हमें अच्छी लगी, और इसी तरह की अनेक चीज़ें मिलकर हमारे मन में एक आदर्श छवि बनाती हैं, जिसे हम किसी एक इंसान के भीतर खोजने लगते हैं।

हर व्यक्ति में अपनी भिन्नताएँ, सीमाएँ और विशेषताएँ होती हैं। इस भिन्नता को स्वीकार करना परम आवश्यक है। तभी हम रिश्तों और करियर दोनों में तनाव और असंतोष को कम कर सकते हैं, और स्वस्थ, संतुलित और सजीव जीवन जी सकते हैं।

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