मैं क्या हूँ?
मैं क्या मन हूँ, या मैं विचार हूँ?
मैं एक सोच हूँ, या चेतना हूँ?
या किसी का बस एक सपना हूँ?
मैं ये शरीर हूँ, या अंगों के मेल से बनी एक मशीन हूँ?
क्या मैं धड़कता दिल, साँसों की नली, रक्त धमनियाँ और कोशिकाओं का संगम हूँ?
मैं न्यूरॉन्स का जाल हूँ, या किसी बेचैनी की पुकार हूँ?
भावनाओं का प्रवाह हूँ, या समाज के नियमों का प्रतिफल हूँ?
मैं कोई जीता-जागता प्राणी हूँ, अपनी मर्ज़ी का मालिक, या ऊपर बैठे किसी शक्ति की साज़िश हूँ?
मैं धूल हूँ, मैं कण हूँ, निर्जीव परमाणुओं का जोड़ हूँ।
क्या मैं वायु हूँ, आकाश हूँ, या धरती, जल और अग्नि का मेल हूँ ?
क्या मैं हूँ भी, या मैं हूँ ही नहीं?
कोई तरीका भी तो नहीं, जो ये बता दे।
फिर भी, भीतर कोई बैठा है, जिसको लगता है कि "मैं हूँ"।
क्या हूँ, कौन हूँ, क्यों हूँ, ये मालूम नहीं।
लेकिन इतना तो लगता है कि मैं हूँ।
ये जिसको लगता है कि भीतर बैठा हूँ, ये कौन है?
अगर वही मैं हूँ, तो ये कहने वाला कौन है कि "वो मैं हूँ"?
क्या मैं दो हूँ, या अपने आप में एक इकाई हूँ?
अगर इकाई हूँ, तो वो कौन है, और उसको देखने वाला कौन है?
अगर दो हूँ, तो कब किसने जन्म लिया, और कब कौन मरेगा?
मैं दो नहीं, मैं हज़ार हूँ।
निश्चित ही क्षणभंगुर हूँ।
मैं क्रोध हूँ, मैं शांति भी हूँ।
मैं ईर्ष्या हूँ, मैं उदारता भी।
मैं भय हूँ, मैं साहस भी।
मैं प्रेम हूँ, मैं घृणा भी।
मैं इच्छा हूँ, मैं विरक्ति भी।
मैं एक हूँ, या मैं 100 हूँ?
इन सबके बीच क्या कहीं मैं शाश्वत हूँ?
अगर नहीं, तो कोई बात नहीं।
लेकिन अगर कुछ शाश्वत है, और वो मेरे भीतर है, तो सही मायने में वही मैं हूँ।
वही शाश्वत भीतर बैठा है,
वही चुपचाप देख रहा है
हज़ारों रूपों के जन्म-मृत्यु को,
वही साक्षी बना हुआ है।
फिर क्यों वो हमेशा छुपा रहता है?
अगर मैं वो हूँ,
तो मैं गुस्सा कैसे हो सकता हूँ?
मैं बेचैन कैसे रह सकता हूँ?
मैं विचलित कैसे हो सकता हूँ?
वो किसके नीचे दब गया है?
क्या हज़ारों क्षणभंगुर रूप उस शाश्वत पर भारी पड़ गए हैं?
क्या वो कभी बाहर आ सकता है?
शायद वो कभी छुपा ही नहीं।
शायद मैं ही
अपनी ही आँखों के सामने
खड़ा होकर
खुद को ढूँढता रहा।
शायद जिसे मैं देखना चाहता हूँ,
वो देखने वाली आँख ही है।
जिसे पकड़ना चाहता हूँ,
वो पकड़ने वाला हाथ ही है।
जिसे जानना चाहता हूँ,
वो जानने वाला ही है।
और शायद इसी लिए
मैं उसे कभी जान नहीं पाऊँगा,
क्योंकि जो जान रहा है,
उसे ही मैं
जानना चाहता हूँ।
मैं उससे अलग होकर
उसको कैसे देख सकता हूँ?
अगर "वो" मैं नहीं है,
तो मेरे भीतर कौन है?
और अगर "वो" मैं ही है—
तो फिर
मैं किसको ढूँढ रहा हूँ?
शायद मेरी सारी ज़िंदगी
इसी एक भ्रम की यात्रा है—
एक “मैं”
दूसरे “मैं” को ढूँढ रहा है।
एक द्रष्टा
अपने ही दर्शन की कोशिश कर रहा है।
और हर बार
जब मैं कहता हूँ—
“शायद ये मैं हूँ।”
कुछ अंदर से चुपचाप
मुस्कुरा देता है।
जैसे कह रहा हो—
“जिसे तू ढूँढ रहा है,
उस से कभी अलग था ही कब?”
फिर भी
मैं निश्चित नहीं हूँ।
शायद ये भी एक विचार है,
शायद ये भी मन का खेल है।
शायद कोई शाश्वत नहीं,
शायद कोई साक्षी नहीं,
शायद कोई “मैं” भी नहीं।
लेकिन—
इस सब के न होने को भी
जो जान रहा है,
वो कौन है?
...
मैं नहीं जानता।
और शायद
पहली बार
मुझे न जानना ही
सच के सबसे करीब लगता है।
इसलिए अब
मैं खुद को
किसी नाम से नहीं पुकारता।
न शरीर,
न मन,
न विचार,
न चेतना,
न आत्मा,
न शून्य।
बस—
जो है,
उसे होने देता हूँ।
और जो मैं हूँ—
शायद उसे
जानने की ज़रूरत ही नहीं।
क्योंकि शायद
मैं कौन हूँ
ये जान लेना
ही “मैं” को ख़त्म कर देना है।
और जब “मैं” ख़त्म हो—
तो शायद
पहली बार
वो दिखे
जो हमेशा से
यहीं था।
या फिर—
कुछ भी न दिखे।
और तब भी...
कुछ तो होगा
जो कहेगा—
“मैं हूँ।”
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